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Darvaje Par Bhojan... "Tripti"

Posted on 18-Aug-2018 04:49 PM
दरवाजे पर भोजन.... ‘‘तृप्ति’’
 
तारांशु पत्रिका का यह अंक तृप्ति योजना को केन्द्र में रखकर बना है.... तो सोचा कि क्यों ना इसी योजना के बारे में अपने विचार आप सभी से बाँटु। तारा संस्थान ने तारा नेत्रालय उदयपुर प्रारंभ होने के पूर्व में ही कई आई कैम्प लगाये थे और जब अक्टूबर, 2011 में तारा नेत्रालय, उदयपुर प्रारंभ हुआ तो बहुत ज्यादा कैम्प लगने लगे। कैम्पों में हमारे कार्यकर्त्ता जाते तो वहाँ पर बहुत से बुजुर्ग मिलते जिनके बच्चे शहरों या महानगरों में काम करने गए और सालों तक आते ही नहीं थे और ऐसे ही बुजुर्गों के लिए तारा के माध्यम से फरवरी, 2012 में आनन्द वृद्धाश्रम प्रारंभ किया। इसमें कुछ बुजुर्ग गाँवों से रहने भी आए लेकिन वो कुछ न कुछ बहाना करके चल गए। यह बात शुरू में समझ में नहीं आई कि सारी सुविधाएँ मिलने के बावजुद ग्रामीण लोग वृद्धाश्रम की बजाए टूटे-फूटे झोपड़े या मंदिर या कहीं भी और लेकिन उसी गाँव में क्यों रहना चाहते हैं जबकि दो वक्त के भोजन के लिए भी उनकी निर्भरता दूसरों पर थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी कि गाँवों के लोग अपनी मिट्टी, अपना परिवेश, पास पड़ोसी आदि नहीं छोड़ेंगे चाहे वो भूखे ही रह जाये.... और सच भी है अपना घर सबको प्यारा लगता है चाहे तो कोई महल हो या झोपड़ा... तो फिर क्या किया जाए... इसी तो फिर के उत्तर में यह विचार आया कि वो हमारे पास नहीं रह सकते लेकिन हम तो उन तक जा सकते हैं.... विचार विमर्श हुआ और एक लिस्ट बनी कि क्या क्या सामान उन तक पहुँचाना है जिसमें आटा, तेल मसाले दालें आदि। फिर एक सुझाव आया कि छोटी सी राशि नकद भी उन्हें दें ताकि कुछ भी उन्हें खरीदना हो चाहे थोड़ा दूध या कभी-कभार कोई हरी सब्जी तो वो ले तो सके और फिर यह निष्कर्ष निकला कि 300 रु. नकद भी प्रतिमाह उन्हें मासिक खाद्य सामग्री के साथ देवें। बस फिर यह सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे बुजुर्ग मिलते गए उन्हें मासिक राशन और 300 रु. कैश देने लगे। इस बात का जरूर ध्यान रखा कि चाहे कम लोगों को दें लेकिन यह सहायता प्रतिमाह उन्हें मिले तब तक जब तक वे जीवित हैं और इस योजना की खुबसूरती ही यह है कि आपका शरीर नहीं चल रहा, आपके बच्चे आपके साथ नहीं है और आपके लिए महीने भर का भोजन आपके दरवाजे पर पहुँच रहा है। है न तृप्त करने वाला? जी हाँ, इसलिए नाम ‘‘तृप्ति’’ रखा क्योंकि जो पा रहा वो ‘‘तृप्त’’, जो देने का माध्यम बने वो भी ‘‘तृप्त’’ और सबसे महत्त्वपूर्ण वो दानदाता जो इस योजना में सहयोग दे रहे वो भी ‘‘तृप्त’’!
 
दीपेष मित्तल

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