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Dhaai Aakhar Prem Ke...

Posted on 20-Aug-2018 11:39 AM
ढाई आखर प्रेम के....
 
तारांशु का यह अंक बनाने का सोचा तो बहुत से विचार मन में थे लेकिन लगा कि अब एक तारा संस्थान कि सारी गतिविधियों पर तो कई बार बात कर चुके हैं तो फिर, इस तो फिर के जवाब में विचार आया कि कुछ भावनाओं की बात कर ली जाए, वैसे भी मनुष्य जीवन में कितनी भी भौतिक आवश्यकताएँ पैदा करें उन्हें हासिल भी कर लें, लेकिन जो तृप्ति अपनों का प्यार पाकर होती है वो किसी भी भौतिक वस्तु से हो ही नहीं सकती है। जो अपना आनन्द वृद्धाश्रम है इसमें अब तक 100 के आस-पास वृद्धजन रहने आए होंगे और यहाँ अभी अलग कमरे नहीं हैं तो भी वर्तमान में तीन वृद्ध दंपत्ति रह रहे हैं और इसके पहले भी यहाँ 3 दंपत्ति यहाँ रहे थे। जो दंपत्ति यहाँ रह रहे हैं उनके आपस का प्रेम देखकर लगता है कि किसी ने सही कहा है कि ‘‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए’’ और इन्हें ही क्यों अपने घर में आस पास, बाग में या कहीं भी वृद्ध पति पत्नी दिखते हैं तो हम महसूस कर सकते हैं कि बुढ़ापे में प्यार के क्या मायने है। एक उम्र के बाद प्रेम अलौकिक हो जाता है जहाँ बस एक ऐसा साथी चाहिये होता है जो अपनेपन का एहसास कराये। हमारे एक अंकल बेटों से तकलीफ के कारण आनन्द वृद्धाश्रम आए तो साथ में उनकी पत्नी भी आ गई जबकि वो अपने घर में मजे से रह सकती थी और अब वे दोनों यहाँ जिस तरह से रह रहे हैं तो लगता है कि अगर ये अलग हो जाते तो गज़ब हो जाता। जब मैंने पहली बार अमिताभ बच्चन जी की फिल्म ‘‘बागबान’’ देखी थी तो लगा नहीं था कि बच्चे माँ-बाप को अलग-अलग कर सकते हैं लेकिन यहाँ तो कई हकीकतें ऐसी देख लीं। 
हमारे पास तो बहुत से बुजुर्ग ऐसे आते हैं जिनके पति या पत्नी में से किन्हीं एक की मृत्यु होने पर उन्होंने बच्चों का घर छोड़ दिया वरना शायद एक दूसरे के प्रेम के सहारे ही वे बच्चों के दिए अपमान को झेल लेते होंगे। कभी-कभी तो पत्नी बहुत सी बातों को ढाप कर रखती है तो पति को कष्टों का एहसास ही नहीं होता और वे बच्चों के पास रह लेते हैं लेकिन बिना पत्नी के वो पिता बच्चों का घर छोड़ देता है। वैसे भी हमारे समाज में स्त्रियों की सहनशक्ति बहुत अधिक होती है लेकिन पति के न रहने पर भी कई माएँ हमारे पास रहने आ जाती हैं, शायद उनके बच्चे शिक्षित तो बहुत हुए होंगे पर बस वो ढाई अक्षर के मामले में निरक्षर हो गए।
तारा संस्थान से जुड़े हुए हमारे अधिकांश दानदाता भी पकी हुई उम्र के ही हैं और वे भी यह समझते होंगे कि इस उम्र में जीवनसाथी के क्या मायने हैं। चाहें लाख लड़ झगड़ लें, रूठ-मना लें लेकिन इस उम्र में जो सबसे प्यारा लगता है वो अपना जीवनसाथी ही है। एक वो ही तो है जिसे आप हक से कुछ भी कह सकते हैं और उसे सुनना ही है। मैंने यहाँ तारा में देखा कि एक अंकल अपनी ठमक त्पककमद पत्नी का सब काम करते थे और बिलकुल भी बिना शिकन के तो यही लगता कि यही तो प्यार होता है। एक और अंकल-आंटी थे दोनों ही बिस्तर पर लेकिन आंटी करवा चौथ के दिन पूरी सजती, मेहन्दी लगाती और लेटे-लेटे ही अंकल का पूरा ध्यान रखती, अंकल को जरा सी किसी चीज़ की जरूरत होती तो तुरंत किसी को बुलाती। हमने इन जोड़ों को बिछड़ते भी देखा है क्योंकि दोनों में से किसी एक को तो पहले जाना ही होता है तो तकलीफ होती है। मेरा जो भी कुछ थोड़ा बहुत अनुभव है उस से मुझे तो ऐसा लगता है कि वृद्धावस्था में पति पत्नी का प्रेम बढ़ जाता है क्योंकि तब वे सब भौतिक चीजों से ऊपर उठ जाते हैं और बस एक दूजे के लिए ही जीते हैं। उनका सारा समय एक दूसरे का होता है और इस प्रेम को और भी खूबसूरत बना देती है एक दूसरे की ब्ंतम और ये ब्ंतम ही वह एहसास है जो प्रेम को दिन प्रतिदिन बढ़ाता है। तो बस इस एहसास को बनाए रखने के लिए एक छोटी सी विनंती है कि जो भी उम्र के इस पड़ाव पर हैं वे कोशिश करें कि स्वस्थ रहें जिससे कि इस आलौकिक प्रेम को अधिक-से-अधिक भोग सकें....
आदर सहित....
 
दीपेश मित्तल

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