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Ek Asamay Vidai

Posted on 01-Nov-2018 12:03 PM

एक असमय विदाई

मार्च या अप्रैल, 2015 की बात है तारा संस्थान के फोन नम्बर पर ये सूचना आई कि इलाहाबाद में एक आंटी है वो अपना घर और समस्त सम्पत्ति तारा संस्थान को दान देना चाहती है। वे चाहती है कि उनके घर में एक वृद्धाश्रम चलाया जाये। कोई बिना जाने अपना सब कुछ तारा को कैसे दे देगा समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन प्रयास ये रहता है कि दानदाता की भावना का सम्मान अवश्य हो सो बस श्रीमती रमन गौड़ आंटी से बात कर ली। बात बहुत आत्मीयता से हुई और उन्होंने ज़िद पकड़ ली कि तुम इलाहाबाद आओ मैं अच्छे काम के लिए अपना सब कुछ देना चाहती हूँ। घर और बच्चों को एकदम छोड़कर जाना मुमकिन नहीं होता है लेकिन उनकी ज़िद थी कि मैं ही उनसे मिलूं सो मई, 2015 में मैं और दीपेश जी इलाहाबाद पहुँचे। उनके घर गये, लगा ही नहीं पहली बार मिले हो, इतना प्यार, इतनी आत्मीयता मुझे नहीं समझ आता कि ईश्वर ने कब कहाँ कौन से रिश्ते जोड़ रखे होते हैं। पता चला कि उनके पति श्री रवीन्द्र नाथ गौड़ का स्वर्गवास कुछ साल पहले हो गया था और श्रीमती गौड़ जो अब इतनी सी देर में मेरी रमन आंटी बन गई थी, चाहती थी कि उनके पति की स्मृति में उनके घर में वृद्धाश्रम बने। उसके लिए वे अपनी चल-अचल संपत्ति पूरी तरह ‘‘तारा संस्थान’’ के नाम करना चाहती थी। रमन आंटी के बच्चे नहीं थे सो उनकी सोच थी कि उनके पति की स्मृति में एक अच्छा काम उनके हाथों हो जाए। रमन आंटी के सलाहकार थे श्री सत्यदेव जी गुप्ता जो कि उनके पति के मित्र थे और रमन आंटी उन पर पूरा विश्वास करती थी और उनसे राय करके ही वे सम्पति को दान कर रही थी। सत्यदेव जी को यह गलतफहमी थी कि नारायण सेवा संस्थान और तारा संस्थान एक ही है लेकिन जब मैं मिली और उन्हें बताया कि तकनीकी रूप से नारायण सेवा और तारा अलग हैं तो वे बोले कि हम तो एक ही समझ रहे थे। उन्हें मैंने समझाया भी कि आप कहें तो मैं अपने पापा आदरणीय कैलाश जी ‘मानव’ से बात करा देती हूँ नारायण सेवा विकलांगों के लिए कार्य कर रही है और तारा बुजुर्गों के लिए लेकिन दोनों के प्रेरणा स्रोत मेरे पापा ही हैं और सबसे बड़ी बात कि इलाहाबाद आने से पहले रमन आंटी को सब कुछ साफ-साफ बताया गया था लेकिन सत्यदेव जी मानने को तैयार ही नहीं थे। रमन आंटी दुविधा में फंस गई उनका मन था कि वे तारा के नाम विल करें पर वे श्री सत्यदेव जी के विरूद्ध भी नहीं जाना चाहती थी। मैंने आंटी को समझाया कि वे परेशान ना हों और सत्यदेव जी जब राजी हों तब ही वे संस्थान के नाम सब करें। मैं फिर उदयपुर आ गई लेकिन रमन आंटी धुन की पक्की थीं उन्होंने सत्यदेव जी को मनाया और उन्हें तारांशु पत्रिका भी बताई और विश्वास दिलाया कि तारा संस्थान वाकई अच्छा काम कर रही है। वे मान गए और उन्होंने बहुत ही सधी भाषा में कागजात बनवाए।
रमन आंटी के पति को शेयर लेने का शौक था और उनसे काफी शेयर उनके पास इकट्ठे हो गए थे। सत्यदेव जी के निर्देशानुसार वे शेयर उन्होंने तारा को ट्रांसफर कर दिए ताकि उनको बेच कर जो राशि मिले उससे रमन आंटी की मृत्यु के बाद उनके घर में वृद्धाश्रम चल सके।
लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं होता है रमन आंटी को कुछ लोगों ने ये कह दिया कि संस्थान वाले आपका पैसा खा जाएंगे तो उन्होंने मुझसे कहा कि मेरे जीते जी ही मेरे घर के ऊपर वाले फ्लोर पर वृद्धाश्रम बना दो। उन्हें विश्वास दिलाने के लिए उनके घर के ऊपर एक मंजिल बनाई गई और उसमें वृद्धाश्रम के उद्घाटन की दिनांक 21 नवम्बर, 2016 तय की गई। मुझे याद है आंटी का चहकना उनकी जीवन्तता और उनके अंदर की खुशी। जब हम उद्घाटन के लिए गए तो उन्होंने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसीपल, पार्षद और न जाने कितने अतिथियों को बुलवाया था। मेहमानों की व्यवस्था, हमारी व्यवस्था सब कुछ उनके निर्देशानुसार हो रहा था। उनका सपना पूरा होने जा रहा था। मुझसे बोली कि लोग कहते थे कि देखना ये संस्थान वाले वृद्धाश्रम नहीं बनाएँंगे पर तुमने मेरी बात रख कर उन्हें जवाब दे दिया। लेकिन उद्घाटन में एक कमी रह गई श्री सत्यदेव जी गुप्ता रमन आंटी की विल बनवाने के कुछ महीनों बाद ही गुजर गए थे। वे हमेशा कहते थे कि आप ये कागज बनवा लो, पता नहीं मैं रहूं या ना रहूं। मुझे लगा ही नहीं कि ये सच भी हो सकता है ऐसा लगा मानो ईश्वर ने उन्हें इस अच्छे कार्य के लिए ही जीवित बचा रखा था।
रमन आंटी लगभग 1 वर्ष पूर्व उदयपुर भी आई थी। इस उम्र में उनके चेहरे पर एक तेज था वे खुद से कार भी चला लेती थी और मैंने सुना था कि अंकल के गुजरने के बाद उन्होंने कार चलाना सीखा था। जिस उम्र में पुरूष भी अपने आपको रिटायर मान लें उस उम्र में रमन आंटी का कार चलाना उनके जीवट की निशानी था। अपनी सम्पति से उन्होंने आवश्यकतानुसार रिश्तेदारों, मित्रों का भी सहयोग किया और फिर शेष का सदुपयोग उन्होंने सोचा। वो सोचना और कर जाना भी साहसी सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना असंभव है।
अभी सितम्बर के अंतिम सप्ताह में इलाहाबाद वृद्धाश्रम के केयरटेकर दयाराम जी ने बताया कि आंटी की तबीयत खराब है, उन्हें अस्पताल में दिखाया गया, शुरू में लगा डेंगू है लेकिन बाद में पता लगा उन्हें ब्लड कैंसर हो गया है। समझ में नहीं आ रहा था कि ये कैसे हो गया। मैं इलाहाबाद गई और उन्हें मनाया कि दिल्ली के राजीव गाँधी कैंसर हॉस्पीटल में ले जाये। वे, उनके भांजे भांजी सब दिल्ली आए उनके लिए ग्राउण्ड फ्लोर का कमरा रखा था लेकिन वे बोली कि क्या मैं ऊपर नहीं चढ़ सकती और आराम से दो मंजिल चढ़ गई। लेकिन उसी रात वे बेसुध हो गईं। उन्हें राजीव गाँधी कैंसर हॉस्पीटल ले गए वहाँ कुछ दिन रहने के बाद डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। वापस इलाहाबाद ले गए वहाँ दिनांक 8 अक्टूबर, 2018 को उन्होंने देह त्याग दी। विश्वास ही नहीं हुआ कि एक हँसता खेलता जीवन ऐसे चला गया। रमन आंटी गजब के आत्म विश्वास वाली महिला थी। कभी-कभी बोलने में थोड़ी कड़क लगती थी लेकिन दिल से बहुत ही कोमल थी। अपना सब कुछ दान देकर भी उनका जी नहीं भरा तो जाते जाते देहदान भी कर गई। इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज जहाँ उनकी पार्थिव देह दान की गई उसमें सारे मेडिकल छात्र संफेद एप्रिन पहले उनके सम्मान में सर झुकाए खड़े थे, ऐसे जैसे किसी शहीद सैनिक के सामने उसकी यूनिट खड़ी हो वे सैनिक तो नहीं थी लेकिन साहस का बहुत बड़ा उदाहरण रहीं....
उनकी आत्मा की परम शांति की कामना के साथ।
आदर सहित...

कल्पना गोयल

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