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Ek Patra Dandataon Ke Naam

Posted on 28-Jan-2019 11:20 AM
एक पत्र दानदाताओं के नाम
 
आप सभी आदरणीय को प्रणाम
 
आप में से बहुत ही कम महानुभाव हैं जिनसे मैं मिल पाई हूँ लेकिन तारांशु एक ऐसा माध्यम है जिससे आप सब से संवाद हो जाता है और आप सब भी पत्रों के माध्यम से अपने हृदय के उद्गार हमें भेजते रहते हैं जिससे आपकी भावना भी हम तक पहुँचती है। तारांशु के इस आर्टिकल में सामान्यतया तारा की कई गतिविधियों की चर्चा होती है लेकिन नया वर्ष शुरू हुआ और नये वर्ष के पहले पखवाड़े में दान का त्योहार (मकर संक्रांति) आता है तो इससे बेहतर अवसर क्या होता है दानदाताओं से बात करने का। 
 
वैसे हमारी संस्कृति भी कितनी समृद्ध है कि दान के लिए भी एक शुभ दिन तय कर लिया कि भले ही साल भर आप दान करते हों या ना भी करते हों तो भी 14 जनवरी, 2019 को संक्रांति का यह दिन अपने को याद दिला ही देगा कि कुछ अच्छा भी कर लिया जाये। मुझे अच्छी तरह याद है जब हम छोटे बच्चे थे तो मम्मी इस दिन कुछ अनाज निकाल कर रख देती थी और घर के पुराने कपड़े भी जो संक्रांति के दिन ये बांटे जाते थे। ये सब भले साल में एक दिन होता था लेकिन बचपन में कोई बात की हो तो ताउम्र वो हमारे अवचेतन में रहती है और शायद इसी को संस्कार कहते हैं। सिर्फ हिन्दू ही नहीं हर धर्म में दान को बहुत अधिक अहमियत दी है तभी तो ‘‘तारा’’ या ‘‘नारायण सेवा’’ लगातार चल रही है। सालों साल से आप लोग धर्म, जाति, प्रांत, भाषा सभी सीमाओं से परे जाकर दान देते हैं। 
 
कभी-कभी मैं दानदाताओं की मनःस्थिति समझने का यत्न करती हूँ, मन तो हमेशा गतिमान है और ये गतिमान मन अरमान या इच्छाएँ पैदा करता है और ये अरमान अनंत हो सकते हैं लेकिन आप सब इन अरमानों को विराम देकर अपनी मेहनत की कमाई में से कुछ निकालते हैं ऐसे लोगों के लिए जिनसे आपका कोई परिचय नहीं है और जैसा मैंने पहले भी कई बार कहा है कि ‘‘तारा’’ में बड़ा दान देने वाले थोड़े से दानदाता हैं। 80-85 प्रतिशत दान उन लोगों से आता है जो थोड़ा-थोड़ा दान देते हैं और बस बूँद-बूँद से घड़ा भर जाता है। आप सभी में परहित का संस्कार बचपन में ही डाला गया होगा तभी तो आप अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर दान दे रहे हैं। आप में से कई महानुभाव तो साल में कई-कई बार सहयोग भेजते हैं मतलब आप के लिए संक्रांति तो कभी भी आ जाती है।
 
एक बात और, एक समय ऐसा था कि जब दान देने वाले बुजुर्ग होते थे लेकिन जमाना तेजी से बदला तो नेकी की प्रवृति भी नयी पीढ़ी में आई है हमारे यहाँ कई युवा जोड़े अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर आते हैं और उन्हें देखकर बच्चों में भी तो भाव जगता ही होगा औरों के लिए कुछ करने का। कभी-कभी कोई युवा बच्चे अपने मम्मी-पापा की इच्छा पूरी करने को भी दान देते हैं और वो भी बेहद प्यार और सम्मान से तो मन गदगद होता है कि श्रवण कुमार अभी भी हैं।
 
मुझे नहीं पता कि मैं आप सबका धन्यवाद किन शब्दों में करूँ लेकिन आप सबकी उस भावना को मेरा प्रणाम जिसके वशीभूत आप ये सब करते हैं। वक्त जिस तरह बदल रहा है भारत में भी एक दिन ऐसा आएगा जरूर जब किसी को किसी के सहारे की जरूरत न होगी। सभी को सब सुविधाएँ उपलब्ध होंगी तब तक आप और हम मिलकर थोड़ा बदलाव लाते रहेंगे और हमारी ये जुगलबंदी खुशियाँ बाँटती रहेगी।
 
नया साल आप सबके लिए बहुत ही शुभ हो इसी कामना के साथ....
 
आदर सहित....
 
कल्पना गोयल

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