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Jaddojahad... Ek Zindagi Bachane Kee...

Posted on 18-Aug-2018 04:24 PM
जद्दोजहद.... एक जिंदगी बचाने की....
 
आज से लगभग ढ़ाई साल पहले मुम्बई के सांताक्रूंज में रहने वाले रमेश भाई शाह का फोन आया था कि तारा संस्थान के आनन्द वृद्धाश्रम में यदि जगह हो तो मैं एक बुजुर्ग को भेजना चाहता हूँ.... जगह थी तो मैंने हाँ कर दी.... थोड़े दिनों बाद एक बुजुर्ग मुंबई से आ गए उनका नाम था विवेकानन्द खरे। जब विवेक आए तो वो ठीक से चल भी नहीं पाते थे बल्कि खड़े होने के लिए भी उनको वॉकर का सहारा लेना पड़ता था, इतने कमजोर थे कि लगता था मानो शरीर में जान ही ना हो। ‘‘आनन्द वृद्धाश्रम’’ में जब अच्छा खाना-पीना हुआ तो विवेक जी के शरीर मे जान आने लगी और वो वॉकर के सहारे चलते लगे। फिर वॉकर भी छूट गया, एक छड़ी के सहारे अब वो आराम से घूम सकते थे। धीरे धीरे विवेक आनन्द वृद्धाश्रम के काम में हाथ बंटाने लगे... बाजार से समान लाना हो या तृप्ति योजना के बुजुर्गों हेतु खाने के पैकेट बनाना सब में वो मदद करते.... कभी कभी तो आनन्द वृद्धाश्रम में कोई बुजुर्ग ज्यादा बीमार हो जाते और बिस्तर में ही मल-मूत्र कर देते तो विवेक उनको भी साफ कर कपड़े बदल देते थे जो कि मेरे हिसाब से बहुत मुश्किल कार्य था। पिछले कुछ सालों में विवेकानन्द खरे आनन्द वृद्धाश्रम में प्यार से ‘‘विक्की’’ के नाम से जाने लगे और सभी बुजुर्ग उनसे स्नेह करने लगे। विवेक जब तारा संस्थान में आए जो उनके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी, श्री रमेश जी शाह जिन्होंने विवेक को भेजा था, उनसे एक दो बार बात हुई और विवेक जी की जो कहानी सुनने को मिली वो रोंगटे खड़े करने वाली थी :
‘‘रमेश भाई सप्ताह में एक दिन मुम्बई में भिखारियों को खाना खिलातें है और ऐसे ही एक दिन वो जब भिखरियों को भोजन करवा रहे थे तो उन्हें विवेक जी मिले.... विवेक जी थोड़ी बहुत अंग्रेजी बोल रहे थे, यह देख कर रमेश भाई थोड़ा चौंक गए और उन्हें लगा यह व्यक्ति भिखारी तो नहीं हो सकता, जरूर कोई परिस्थिति इसे सड़क पर लाई है। रमेश भाई ने विवेक जी से बातचीत की तो विवेक ने बताया की वो मेकेनिकल इंजीनियर थे और उनका मुम्बई के जुहु इलाके में एक फ्लेट था। जब विवेक रिटायर हुए तो उनके भाई ने उनसे कहा कि यह फ्लेट बैच कर यह पैसा मुझे दे दो तो मैं और मेरा परिवार आपकी ताउम्र देखभाल करेंगे, क्योंकि विवेक जी ने शादी नहीं की थी और उनका कोई परिवार नहीं था, इसलिए उन्होंने भाई की सलाह मानी और फ्लेट बैच कर पैसे भाई को दे दिये। भाई और उनके परिवार ने विवेक जी की थोड़े समय तो देखभाल थी लेकिन फिर कुछ न कुछ कारण बताकर उनको घर से निकाल कर मुम्बई के ही एक वृद्धाश्रम में छोड़ दिया जहाँ पर वृद्ध लोगें से रहने खाने पीने का पैसा लिया जाता था। विवेक अपना शेष जीवन वहाँ बिता लेते लेकिन जिस भाई ने फ्लेट का सारा पैसा अपने पास रख लिया था उसने वृद्धाश्रम को पैसा देना भी बन्द कर दिया तो वृद्धाश्रम ने भी विवेक जी को बाहर निकाल दिया। बस यही से विवेक जी सड़क पर आ गए और भिखारियों का जीवन बिताने लगे। जो मिलता वो खा लेते और नहीं मिलता तो नहीं खाते। और इस कारण वे इतने कमजोर हो गए थे के उनसे ठंग से खड़ा भी नहीं हुआ जाता था। जब भी मैं विवेक जी को देखती तो मन में विचार आता कि कोई भाई इतना कूर कैसे हो सकता है कि अपने भाई की सम्पत्ति हड़प कर उसे सड़क पर भीख मांगने छोड़ दिया....! यदि रमेश भाई विवेक को तारा संस्थान में नहीं भेजते तो वे भी मुम्बई की सड़क पर एक लावरिस लाश बनकर समाप्त हो जाते। लेकिन नीयति उनको बचाना चाहती थी तो विवेक बच गए। विवेक एक अच्छा खाता-पीता जीवन आनन्द वृद्धाश्रम में और सभी बुजुर्गों के साथ मिल जुल कर बिता रहे थे.... कुछ महीनों पहले विवेक जी के मुह में एक गांठ का पता लगा। उदयपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में उनको दिखाया गया तो डॉ. ने आशंका व्यक्त थी कि शायद यह गांठ कैंसर हो सकती है। गांठ की बायोप्सी करवाई गई और डॉ. की आशंका सच निकली--विवेक को कैंसर था। हमें जब यह पता लगा तो थोड़ा परेशान हुए क्योंकि मालूम था कैंसर का इलाज न केवल मुश्किल होता है बाल्कि बहुत महंगा भी होता है। मन में यहाँ खयाल आया कि ईश्वर ने जब उन्हें हमारे पास भेजा है तो उसकी इच्छा यही होगी की हम उनकी जिन्दगी बचाएँ। इसी खयाल ने ताकत दी और यह निर्णय किया कि विवेक जी को अच्छे से ईलाज करवा कर स्वस्थ किया जाए..................सरकारी अस्पताल में पता किया तो बताया गया की उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा लेकिन वहाँ ऑपरेशन की सुविधा नहीं थी। ऑपरेशन के लिए निजी अस्पताल में पता किया तो वह बहुत ही महंगा लग रहा था। कहीं से पता लगा की मुम्बई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में कम पैसे में ऑपरेशन हो जायेगा तो विवेक जी को संस्थान के एक कार्यकर्त्ता के साथ मुम्बई भेजा। मुम्बई के टाटा मेमोरियल में बहुत सारी जाँचें हुई और उन में भी विवेक जी के कैंसर की पुष्टि हुई। टाटा मेमोरियल में विवेक जी को बार-बार लाना और ले जाना बहुत ही पीड़ादायक था। क्योंकि मीरा रोड़ स्थित तारा के हॉस्पीटल जहाँ वो रुके हुए थे वहाँ से टाटा मेमोरियल आना जाना और घंटों डॉ. को दिखाने व जाँचें के पहले इंतजार करना तकलीफ देय था। तो फिर यह सोचा गया कि उदयपुर के एक निजी अस्पताल में ही इनका ऑपरेशन करवा दिया जाए। विवेक जी को उदयपुर के निजी अस्पताल में बताया गया और एक जाँच में यह पता लगा के उनके फेफड़े में भी एक गांठ है। वह गांठ भी अगर कैंसर होती तो विवेक जी की मुंह वाली गांठ का ऑपरेशन भी नहीं किया जाता क्योंकि कैंसर यदि ज्यादा फैला हुआ हो तो ऑपरेशन का कोई फायदा नहीं होता है। फेफड़े की गांठ की बहुत महंगी एक जाँच अहमदाबाद से हुई और उसमें यह पता लगा की कैंसर नहीं है। दिनांक 27 जुलाई, 2015 को विवेक जी के मुंह में कैंसर का ऑपेरशन किया गया। जबड़े का एक बहुत बड़ा हिस्सा हटाकर उसकी जगह दूसरा मांस लगाया गया। यह लेख लिखे जाने के कुछ दिन पूर्व विवेक जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। जब तक घाव नहीं भरेंगे तब तक कुछ खा नहीं सकेंगे। उनके नाक में भोजन देने की एक नली लगी हुई है, जब घाव भर जाएंगे तो विवेक जी को कीमिओथैरेपी या रेडियोंथेरेपि दी जाएगी और हमें विश्वास है कि वे पूर्णतः स्वस्थ होंगे। श्री विवेकानन्द खरे या विवेक या विक्की जिनका वर्णन इस लेख के माध्यम से किया है वो आप से दो बाते बताने का प्रयास है :-
1. जिन बुजुर्गों के लिए हम काम करते है तो उनमें से अधिकांश पीड़ित बुजुर्ग वे हैं जिन्होंने अपनी सम्पत्ति अपनी मृत्य के पहले अपने बच्चों या रिश्तेदारों को दे दी और सम्पत्ती लेने के बाद उन्हीं बच्चों या रिश्तेदारो ने उन बुजुर्गों को घर से निकाल दिया, तो यह बहुत बड़ी एक सीख है कि अपनी सम्पत्ति बच्चों के नाम अवश्य करें पर अपनी मृत्यु के बाद।
2. दूसरी, तारा संस्थान का आनन्द वृद्धाश्रम जो की बुजुर्गों के लिए पूर्णतयाः निःशुल्क है उसमें सिर्फ उनके रहने या अच्छा खाने कि व्यवस्था भर नहीं है वरन हमारा यह प्रयास रहता है कि निःशुल्क होने के बावजुद हम रहने वाले बुजुर्गों को हर संभव मेडिकल सुविधा भी उपलब्ध कराऐं। विवेक जी के पहले भी हमने कुछ गम्भीर बीमार बुजुर्गों पर कुछ लाख रूपये तक खर्च किए--चाहे संस्थान भी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो। हम यह मानते है कि जब एक जिम्मेदारी ली है तो उसका पूर्ण वहन हमारे द्वारा हो। अन्त में मैं उन सभी दानदाताओं का आभार व्यक्त करूंगी जिन्होंने श्री विवेक जी के ईलाज हेतु अपना सहयोग दिया। और वृद्धाश्रम के प्रभारी श्री राजेश जैन एवम् श्री चिमन भाई को भी धन्यवाद दूंगी जिन्होंने विवेक जी के ईलाज में पूरी निष्ठा से काम किया।
 
कल्पना गोयल

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