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Prem Ke Dhaage

Posted on 20-Aug-2018 11:15 AM
प्रेम के धागे
रक्षा बंधन से दो दिन पहले मैं तारा संस्थान के ऑफिस में बैठी थी कि किसी ने आकर बताया कि अजमेर से बुजुर्ग आए हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। उनसे मिली तो पता चला कि उनको मेरे द्वारा भेजी गई राखी मिली थी, वे चाहते थे कि राखी मेरे ही हाथों से बंधवाएँ सो वे अजमेर से उदयपुर तक चले आए ।
उनसे बात की तो मालूम हुआ कि उनकी 1700 रु.(सत्रह सौ) मासिक आय है जिसमें 1000 रु. कोई पेंशन है और 700 रु. किसी कमरे का किराया आता है। इस मासिक आय में से थोड़ा-थोड़ा बचाकर वे 21000 रु. (इक्कीस हजार रुपये) का दान भी संस्थान के लिए लाए और साथ में एक बड़ी दरी (जाजम) भी लाए कि ये तो घर में ऐसे ही पड़ी थी कुछ काम नहीं आ रही थी। मैंने उन्हें बहुत मना किया कि मैं आपसे दान नहीं लूंगी लेकिन उनकी जिद से नहीं जीत पाई। लिखकर वर्णन करना असंभव है लेकिन मैं उस प्यार से अभिभूत हूँ। तारा संस्थान में जिन्होंने भी हमें दान दिया है उन्हें रक्षा बंधन के पर्व पर एक राखी या रक्षा सू़त्र भेजा था। भेजने के पीछे सोच सिर्फ यह थी कि इतने सारे लोग हमें सहयोग करते हैं और हम आप सबको बदले में सिर्फ जिनकी मदद हो रही है उनके फोटोग्राफ या कभी-कभार कोई निमंत्रण ही तो भेजते रहते हैं लेकिन आप सबके प्रेम की प्रतिक्रिया क्या दे, तो रक्षा बंधन के बहाने हमारा प्रेम भी आप तक पहुँचे।
हमारी इस भावना के बदले इतना इतना प्यार मिला कि मैं बता नहीं सकती। कई लोग ऐसे भी थे जिनको वर्षों से किसी ने भी राखी नहीं बाँधी थी, कुछ ऐसे भी थे जिनके बहन ही नहीं थी या थी तो अब नहीं रही.... मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं कैसे बताऊँ पर हर एक पत्र जो रक्षा सूत्र मिलने पर आप लोगों ने भेजा, वो विशेष था और इतना प्यार पाकर बहुत सी खुशी हुई और कभी आँख भी भर आई। मैं गद्गद् हूँ ‘‘तारा संस्थान’’ में लोगों की सेवा से भी बडा़ सुख है। आप जैसे इतने प्यारें लोगा से जुड़ना मैं अपने आप को खुषनसीब मानती हूँ कि मुझे इतने सारे अच्छे लोगो से मिलने का या जानने का अवसर मिला है। मन तो यही करता है कि आप सबसे मिलकर आपका आभार व्यक्त करूँ पर संभव नहीं हो पाता है सो तारांषु में इन पक्तियों के माध्यम से ही आपसे बात कर रही हूँ। रक्षा सूत्र भेजने का मकसद आपसे दान लेना बिल्कुल नहीं था क्योंकि वो तो आप सब हमेषा ही देते हैं तभी तो तारा संस्थान निरन्तर चल रही है लेकिन फिर भी आप लोगों में से कई महानुभावों ने दान भी दिया उसके लिए भी हृदय से आभार।
कामना बस यही है कि यह रिश्ता हमेशा बना रहे चाहे हम मिले या न मिलें और वैसे भी प्रेम का रिष्ता सारे रिश्तों से ऊपर होता है।
आदर सहित....!
 
कल्पना गोयल

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