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Ravindra Nath Gaur Anand Vrudhashram Prayag...

Posted on 20-Aug-2018 11:31 AM
रविन्द्र नाथ गौड़ आनन्द वृद्धाश्रम प्रयाग, 
संगम, अलफ्रेड पार्क ;एक राष्ट्रीय तीर्थद्ध... कभी न भूलने वाली यादें!
 
नवंबर माह में इलाहाबाद जाना हुआ, उपलक्ष्य था ‘‘रवीन्द्रनाथ गौड़ आनंद वृद्धाश्रम‘‘ का उद्घाटन जो उनकी धर्म पत्नी श्रीमती रमन गौड़़ ने अपने स्वर्गस्थ पति की याद में तारा संस्थान को समर्पित किया है। किसी अपने को कोई सबसे बेहतर श्रद्धांजलि कैसे दे सकता है इसका यह बेहद खुबसूरत उदाहरण है। उद्घाटन हुआ और अब उस वृद्धाश्रम में वृद्धजन भी रहेंगे, और हाँ तारा संस्थान का देश के सबसे बड़े जनशक्ति वाले प्रदेश में एक छोटा सा च्मतउंदमदज प्रकल्प भी शुरू हुआ।
उत्तरप्रदेश में जाना वैसे कम ही हुआ है लेकिन बचपन से पढ़ते आए हैं कि उत्तरप्रदेश भारत के बहुत से महानायकों की जन्म भूमि और कर्म भूमि है। इलाहाबाद गया तो मन में पक्का था कि प्रयाग में दो जगह जाना ही है, एक तो संगम, क्योंकि स्नान करने से पुण्य मिलता है या नहीं ये पता नहीं लेकिन कुछ मान्यताएँ होती हैं सो संगम स्नान किया और सच मानिएं, यमुना में चप्पू वाली नाव में बैठकर संगम स्थल तक जाना आलौकिक आनंद देने वाला था। मुझे ये लगता है कि हमारे पुरखों ने जो ये तीर्थ स्थल पहाड़ों में, समंदर किनारे या नदियों किनारे बनाए थे। उसका धार्मिक महत्त्व जो भी हो, उस बहाने कितने बुजुर्ग इन खुबसूरत जगहों पर अपने जीवन काल में चले जाते हैं। और उनके बच्चे कितने ही गरीब क्यों न हो थोड़ा पैसा जुटा कर माता-पिता को भेज ही देते हैं। वरना सारा जीवन माता-पिता बच्चों की परवरिश फिर बच्चों के बच्चों की परवरिश में ही निकाल देते हैं।
इलाहाबाद में दूसरी जगह जाना था अलफ्रेड पार्क, यह वो स्थान है जहाँ श्री चंद्रशेखर आजाद शहीद हुए थे। बचपन में कोर्स की किताबों में पढ़ा था कि श्री चंद्रशेखर आजाद ने अलफ्रेड पार्क में पुलिस वालों से घिरने पर अपने साथी सुखदेव को बचा कर निकाला और गिरफ्तार होने की बजाए खुद शहीद हो गए। आज उस पार्क का नाम चंद्रशेखर आजाद पार्क ही है, और वहाँ उनकी सुंदर प्रतिमा है। उदयपुर आने पर बचपन के पढ़े इतिहास को ताजा करने के लिए ळववहसम खोला और ‘‘चन्द्रशेखर आजाद‘‘ ैमंतबी किया। यकीन मानिये जब ळववहसम में पढ़ा और अभी लिख रहा हूं तब भी आँखें नम है। एक 24 साल के युवा ने खुद को गोली मार दी, सिर्फ इसलिए कि उसका देश गुलाम न रहे। ऐसी उम्र जिसमें हर युवक एक अच्छी नौकरी, व्यवसाय, शादी परिवार ये ही सब सोचता है, ऐसे में बिना किसी चाहत के ऐसा जज़्बा कैसे जा आता है, सोच से परे है और सबसे बड़ी बात, जब वे 14 साल के थे और गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया था तो उस समय उन्होंने भी उसमें भाग लिया फिर गिरफ्तार हुए। पुलिस ने नाम पूछा तो बताया ‘‘आजाद‘‘ पिता का नाम ‘‘स्वतंत्रता‘‘ और घर ‘‘जेल‘‘। पता नहीं ऐसी हिम्मत उस छोटे से बच्चे में कहाँ से आई होगी।
जीवन में हम स्कूल में जो भी पढ़ते या सीखते हैं। वो ताउम्र मन में रहता है अच्छा हो या बुरा। और यही शिक्षा का महत्त्व है। शिखर भार्गव स्कूल को लेकर यह विशेषांक है तो बस यही लगता है कि हमारा प्रयास हो कि वे बच्चे जिनके पिता नहीं है तो सिर्फ शिक्षा के अभाव में महानायक बनने से न रह जाए क्योंकि वो शिक्षा और संस्कार ही तो थे कि चंद्रशेखर तिवारी, चंद्रशेखर आजाद बनकर अमर हो गए।
एक त्मुनमेज आप सब से है जब भी इलाहाबाद जाए तो संगम के साथ-साथ अलफ्रेड पार्क भी जाए ताकि आपका माथा भी गर्व से ऊँचा हो जाए और हाँ, रवीन्द्र नाथ गौड़ आनंद वृद्धाश्रम तो आप जाएँगे ही।
आदर सहित...
 
दीपेश मित्तल

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